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लत : एक ग़लत फैसला

मेरे अंदर कोई ऐसा छुपा है

जिसे मेरा दिल, दिमाग और आत्मा खफा है

क्योंकि बंधक बना लिया है मुझे

अब न मिलने पर कुछ न सूझे

पहले तो सब अच्छा लगा

जैसे सातवें आसमान पर जा टंगा

पागलपन कर बैठा, कर न सका मैं बयां

बिना वजह लत का शिकार बन गया

एक झलक में मेरी जिंदगी छिन गई

अच्छा दिखकर धोखे वाली बात जो हुई

आश्चर्य है मुझे, हम क्यों ही मिलें

खुद से हैं नफरतों भरें गिले

पहले एक जिंदगी थी जो खुशहाल थी

मगर अब झूठ के साथ करने लगा था चोरी

रोज़ बिस्तर पर पड़े, मौत का है इंतजार

लेकिन लत के वश में हूं, छोड़ने से है इनकार

मैं शिकार हूं उस मजबूत शिकारी का

सुबह उठते ही चाहिए एक डोज़ भारी सा

मुश्किल है अब छुटकारा पाना

एक वक्त था जब मैं भी जाता था जाना

अब यही बन गया मेरा परिवार है

मगर परिवार के लिए बन गया भार मैं

वह मुझे इन हालात में देख नहीं सकते

लेकिन कहीं न कहीं दिल में उम्मीद है रखते

मैंने हिम्मत नहीं की इसे लड़ने की

बेवकूफियां भरी गलतियों की सज़ा थी

मैं अपने लिए कुछ न कर सका

खुद को हमेशा अंधेरे में रखा

चाहे तुम कितने भी लाचार क्यों न हो

ऐसी चीजों से खुद को दूर रखो

ध्यान रखना जो बातें हैं कहीं

यह जिंदगी है कोई खेल नहीं।

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Written by Nidhi Dahiya

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Sushmitha Subramani

Well iterated poem. Addiction eats up the person from within and it is essential to explain the reasons to stay miles away from addictive substances. I am glad that your poem touches the heart and shows the right path. Its good for prevention of addictions.