मुंह नीचे की तरफ़ लटकाए हुए
लेकिन समझ न पाए, कि कहां जाएं?
यह कैसा दुविधा हैं?
एक अजीब सा अहसास हैं
जैसे मेरे अंदर किसी और का वास हैं
बैठे बैठे सोच में बह जाता हूं
खाली आंखों से,
एक तस्वीर होने सा अहसास दिलाता हूं
आस पास वालों को लगता है
कि मैं कुछ कर नहीं रहा
मगर ये कैसे समझाऊं
कि मेरा व्यस्त दिमाग कभी चुप नहीं रहा
हमेशा थका हुआ खुद को पाता हूं
पर खुद को मजबूत बनाना चाहता हूं
क्या कोई सुन सकता है?
मेरे अंदर की आवाज़
है कोई?
जो मेरी पहचान
मेरा वजूद
ये सब बनाएं रख सकता है?
ये खाली और काली दुनिया मेरी नहीं
मेरी जिंदगी बीत रही थी और कहीं
मैं नहीं जानता कि मैं कहां हूं
देख रहा किसी कि राह हूं
मुझे मदद चाहिए खुद को पाने में
जो खोया है वो सब वापिस लाने में।
in हिंदी संग्रह
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